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हेल्थ मिनिस्ट्री का मास्टरस्ट्रोक या कोई बड़ा खतरा? आयातित दवाओं के 'एक्सपायरी खेल' पर केंद्र का चौंकाने वाला फैसला, बदल जाएगी आपकी दवा की उम्र!

दवाओं के 'एक्सपायरी खेल' पर केंद्र का चौंकाने वाला फैसला! केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने दशकों पुराने औषधि नियम में बड़े बदलाव का ड्राफ्ट जारी किया है। विदेशों से आने वाली दवाओं के लिए अब तक लागू 60% शेल्फ-लाइफ की सख्त शर्त को खत्म कर 'न्यूनतम 12 महीने' करने का प्रस्ताव है। क्या यह फैसला देश में जीवनरक्षक दवाओं की बर्बादी और किल्लत को रोकेगा, या मरीजों की सेहत के साथ कोई नया समझौता होगा? जानिए इस बड़े नीतिगत बदलाव के पीछे का पूरा सच और रहस्यमयी अपवाद!

26-06-2026 07:54:50 5 Views
 हेल्थ मिनिस्ट्री का मास्टरस्ट्रोक या कोई बड़ा खतरा? आयातित दवाओं के 'एक्सपायरी खेल' पर केंद्र का चौंकाने वाला फैसला, बदल जाएगी आपकी दवा की उम्र!

नई दिल्ली। देश के स्वास्थ्य क्षेत्र और फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री से आज सुबह-सुबह एक ऐसी खबर निकलकर सामने आई है, जिसने पूरे मेडिकल जगत की धड़कनों को बढ़ा दिया है। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने अचानक एक ऐसा मसौदा (ड्राफ्ट) जारी कर दिया है, जिसके पीछे 'कारोबार की सुगमता' तो दिखाई दे रही है, लेकिन इसके गहरे मायने आम मरीजों की जिंदगी और दवाओं की 'शेल्फ-लाइफ' (शेष गुणवत्ता अवधि) से सीधे जुड़े हैं।

22 जून 2026 की गजट अधिसूचना जी.एस.आर. 505 (इ) के जरिए सरकार ने दशकों पुराने औषधि नियमावली, 1945 के नियम 31 को बदलने की तैयारी कर ली है। लेकिन इस तकनीकी बदलाव के पीछे आम जनता के लिए क्या छिपा है? क्या यह कदम वाकई गेम चेंजर साबित होगा या इसके पीछे कोई अनजाना सस्पेंस है?

नियमों में वो 'बदलाव' जिसने सबको चौंकाया: अब 60% का खेल खत्म!

इस पूरी खबर का सबसे संवेदनशील और सस्पेंस से भरा हिस्सा दवाओं के आयात (Import) के समय से जुड़ा है।

  • अब तक का नियम: विदेशों से आने वाली जीवनरक्षक दवाओं के भारत के पोर्ट पर उतरते वक्त, उसकी कुल शेल्फ-लाइफ (काम करने की अवधि) कम से कम 60 प्रतिशत से अधिक बची होनी अनिवार्य थी।

  • नया प्रस्तावित मोड़: सरकार इस 60% की शर्त को पूरी तरह खत्म करने जा रही है। अब नया नियम यह होगा कि भारत में आयात के समय दवा की बची हुई शेल्फ-लाइफ सिर्फ न्यूनतम 12 महीने होनी चाहिए।

यहीं से सस्पेंस गहराता है: आखिर सरकार को अचानक इस कड़े नियम को ढीला करने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या विदेशों से आने वाली दवाओं की खेप सख्त नियमों के कारण भारत के बंदरगाहों पर दम तोड़ रही थी?

सप्लाई चेन का 'साइलेंट विलेन': क्यों बदली जा रही है दवाओं की उम्र?

मंत्रालय के गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, सख्त नियमों की वजह से दवाओं की एक बहुत बड़ी मात्रा 'सप्लाई चेन' के चक्रव्यूह में फंसकर बर्बाद हो रही थी। विदेशों से दवाएं चलती थीं, लेकिन भारत के पोर्ट्स पर कस्टम और क्लियरेंस के कड़े नियमों के चलते उनकी 60% शेल्फ-लाइफ की शर्त पूरी नहीं हो पाती थी, जिससे करोड़ों की दवाएं कचरा बन जाती थीं।

"यह संशोधन दवाओं की बर्बादी को रोकने का एक बड़ा हथियार है। कम से कम 12 महीने की अवधि मिलने से मरीजों तक दवाएं पहुंचने और उनके इस्तेमाल के लिए पर्याप्त समय मिलेगा, जिससे देश में जरूरी दवाओं की किल्लत और लागत दोनों कम होगी।"

रहस्यमयी अपवाद: कुछ दवाओं पर नियम ढीला क्यों नहीं हुआ?

इस संवेदनशील फैसले में एक और गहरा मोड़ है। सरकार ने सभी दवाओं के लिए नियम तो आसान कर दिए, लेकिन दो खास श्रेणियों को इस छूट से पूरी तरह बाहर रखा है:

  1. जैविक उत्पाद (Biological Products)

  2. रेडियोफार्मास्युटिकल्स (Radiopharmaceuticals)

इन दवाओं के लिए आज भी पुराना '60 प्रतिशत से अधिक बची अवधि' का कड़ा नियम ही लागू रहेगा। आखिर इन दवाओं को लेकर सरकार किस 'पब्लिक हेल्थ' के खतरे से डरी हुई है? क्या इनका असर कम समय में खत्म होना देश के मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब बेहद संवेदनशील है।

क्या दवाओं की क्वालिटी से होगा समझौता? सरकार का सख्त संदेश

जैसे ही यह खबर बाहर आई, बाजार में यह अफवाह उड़ने लगी कि क्या अब भारत में कम असरदार या पुरानी दवाएं डंप की जाएंगी? इस सस्पेंस पर विराम लगाते हुए मंत्रालय ने साफ और कड़े शब्दों में स्पष्ट कर दिया है कि:

"यह बदलाव सिर्फ और सिर्फ आयात के समय की समय-सीमा (Time-limit) के लिए है। ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के तहत दवाओं की सुरक्षा, गुणवत्ता और उनके असर (Efficacy) से जुड़े किसी भी नियम में 1% का भी समझौता नहीं किया जाएगा।"

अब फैसला आपके हाथ में: मंत्रालय ने मांगी राय!

सरकार ने इस ड्राफ्ट को पब्लिक डोमेन में डालकर सभी संबंधित पक्षों, डॉक्टरों और आम जनता से सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं। आप अपनी राय सीधे स्वास्थ्य मंत्रालय, नई दिल्ली को पत्र लिखकर या drugsdiv-mohfw[at]gov[dot]in पर ईमेल के जरिए भेज सकते हैं।

अब देखना यह है कि इस नए नियम के लागू होने के बाद देश में दवाओं की कीमतें कितनी गिरती हैं और क्या वाकई आम मरीजों को इसका सीधा फायदा मिलता है, या फिर यह सिर्फ फार्मा कंपनियों की जेब भरने का जरिया बनेगा!

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26-06-2026 5 Views
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नई दिल्ली। देश के स्वास्थ्य क्षेत्र और फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री से आज सुबह-सुबह एक ऐसी खबर निकलकर सामने आई है, जिसने पूरे मेडिकल जगत की धड़कनों को बढ़ा दिया है। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने अचानक एक ऐसा मसौदा (ड्राफ्ट) जारी कर दिया है, जिसके पीछे 'कारोबार की सुगमता' तो दिखाई दे रही है, लेकिन इसके गहरे मायने आम मरीजों की जिंदगी और दवाओं की 'शेल्फ-लाइफ' (शेष गुणवत्ता अवधि) से सीधे जुड़े हैं।

22 जून 2026 की गजट अधिसूचना जी.एस.आर. 505 (इ) के जरिए सरकार ने दशकों पुराने औषधि नियमावली, 1945 के नियम 31 को बदलने की तैयारी कर ली है। लेकिन इस तकनीकी बदलाव के पीछे आम जनता के लिए क्या छिपा है? क्या यह कदम वाकई गेम चेंजर साबित होगा या इसके पीछे कोई अनजाना सस्पेंस है?

नियमों में वो 'बदलाव' जिसने सबको चौंकाया: अब 60% का खेल खत्म!

इस पूरी खबर का सबसे संवेदनशील और सस्पेंस से भरा हिस्सा दवाओं के आयात (Import) के समय से जुड़ा है।

  • अब तक का नियम: विदेशों से आने वाली जीवनरक्षक दवाओं के भारत के पोर्ट पर उतरते वक्त, उसकी कुल शेल्फ-लाइफ (काम करने की अवधि) कम से कम 60 प्रतिशत से अधिक बची होनी अनिवार्य थी।

  • नया प्रस्तावित मोड़: सरकार इस 60% की शर्त को पूरी तरह खत्म करने जा रही है। अब नया नियम यह होगा कि भारत में आयात के समय दवा की बची हुई शेल्फ-लाइफ सिर्फ न्यूनतम 12 महीने होनी चाहिए।

यहीं से सस्पेंस गहराता है: आखिर सरकार को अचानक इस कड़े नियम को ढीला करने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या विदेशों से आने वाली दवाओं की खेप सख्त नियमों के कारण भारत के बंदरगाहों पर दम तोड़ रही थी?

सप्लाई चेन का 'साइलेंट विलेन': क्यों बदली जा रही है दवाओं की उम्र?

मंत्रालय के गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, सख्त नियमों की वजह से दवाओं की एक बहुत बड़ी मात्रा 'सप्लाई चेन' के चक्रव्यूह में फंसकर बर्बाद हो रही थी। विदेशों से दवाएं चलती थीं, लेकिन भारत के पोर्ट्स पर कस्टम और क्लियरेंस के कड़े नियमों के चलते उनकी 60% शेल्फ-लाइफ की शर्त पूरी नहीं हो पाती थी, जिससे करोड़ों की दवाएं कचरा बन जाती थीं।

"यह संशोधन दवाओं की बर्बादी को रोकने का एक बड़ा हथियार है। कम से कम 12 महीने की अवधि मिलने से मरीजों तक दवाएं पहुंचने और उनके इस्तेमाल के लिए पर्याप्त समय मिलेगा, जिससे देश में जरूरी दवाओं की किल्लत और लागत दोनों कम होगी।"

रहस्यमयी अपवाद: कुछ दवाओं पर नियम ढीला क्यों नहीं हुआ?

इस संवेदनशील फैसले में एक और गहरा मोड़ है। सरकार ने सभी दवाओं के लिए नियम तो आसान कर दिए, लेकिन दो खास श्रेणियों को इस छूट से पूरी तरह बाहर रखा है:

  1. जैविक उत्पाद (Biological Products)

  2. रेडियोफार्मास्युटिकल्स (Radiopharmaceuticals)

इन दवाओं के लिए आज भी पुराना '60 प्रतिशत से अधिक बची अवधि' का कड़ा नियम ही लागू रहेगा। आखिर इन दवाओं को लेकर सरकार किस 'पब्लिक हेल्थ' के खतरे से डरी हुई है? क्या इनका असर कम समय में खत्म होना देश के मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब बेहद संवेदनशील है।

क्या दवाओं की क्वालिटी से होगा समझौता? सरकार का सख्त संदेश

जैसे ही यह खबर बाहर आई, बाजार में यह अफवाह उड़ने लगी कि क्या अब भारत में कम असरदार या पुरानी दवाएं डंप की जाएंगी? इस सस्पेंस पर विराम लगाते हुए मंत्रालय ने साफ और कड़े शब्दों में स्पष्ट कर दिया है कि:

"यह बदलाव सिर्फ और सिर्फ आयात के समय की समय-सीमा (Time-limit) के लिए है। ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के तहत दवाओं की सुरक्षा, गुणवत्ता और उनके असर (Efficacy) से जुड़े किसी भी नियम में 1% का भी समझौता नहीं किया जाएगा।"

अब फैसला आपके हाथ में: मंत्रालय ने मांगी राय!

सरकार ने इस ड्राफ्ट को पब्लिक डोमेन में डालकर सभी संबंधित पक्षों, डॉक्टरों और आम जनता से सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं। आप अपनी राय सीधे स्वास्थ्य मंत्रालय, नई दिल्ली को पत्र लिखकर या drugsdiv-mohfw[at]gov[dot]in पर ईमेल के जरिए भेज सकते हैं।

अब देखना यह है कि इस नए नियम के लागू होने के बाद देश में दवाओं की कीमतें कितनी गिरती हैं और क्या वाकई आम मरीजों को इसका सीधा फायदा मिलता है, या फिर यह सिर्फ फार्मा कंपनियों की जेब भरने का जरिया बनेगा!

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