यूपी परिवहन विभाग की 'फेसलेस' प्रणाली पर बड़ा संकट: 'इंडियन सोशल जस्टिस मिशन ट्रस्ट' ने दी न्यायालय जाने की चेतावनी
लखनऊ: उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर बड़े विवादों के घेरे में है। विभाग द्वारा अपनी 12 संवेदनशील लोक सेवाओं (सारथी एवं वाहन पोर्टल) को पूर्णतः 'ऑटो-अप्रूव्ड' और 'फेसलेस' मोड में स्थानांतरित करने के निर्णय को 'इंडियन सोशल जस्टिस मिशन ट्रस्ट' ने असंवैधानिक और नागरिकों के मूल अधिकारों के विरुद्ध करार दिया है। इस संबंध में ट्रस्ट ने शासन के समक्ष औपचारिक विधिक आपत्ति दर्ज कराते हुए इसे वापस न लेने पर उच्च न्यायालय जाने की चेतावनी दी है।
क्या है पूरा मामला?
यूपी परिवहन विभाग की नई व्यवस्था के तहत अब लाइसेंस और वाहन संबंधी कई सेवाओं के लिए आरटीओ कार्यालय जाने की आवश्यकता नहीं होगी, बल्कि उन्हें 'ऑटो-अप्रूव्ड' प्रणाली से जोड़ दिया गया है। ट्रस्ट का आरोप है कि बिना किसी सुरक्षा मानक और मानवीय विवेक के, एल्गोरिदम के भरोसे पूरी प्रणाली छोड़ देना आम जनता के साथ एक बड़ा धोखा है।
ट्रस्ट ने उठाए चार गंभीर सवाल
इंडियन सोशल जस्टिस मिशन ट्रस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष, कर्मवीर आजाद ने इस व्यवस्था पर चार प्रमुख बिंदुओं के माध्यम से कड़ा प्रहार किया है:
प्रशासनिक शून्यता: कानूनी प्रावधानों (मोटर वाहन अधिनियम) के अनुसार, सत्यापन एक उत्तरदायी 'लोक सेवक' का कार्य है। ट्रस्ट का तर्क है कि लोक सेवक की विवेकपूर्ण शक्ति को 'निर्जीव एल्गोरिदम' को हस्तांतरित करना कानून के मूल सिद्धांत 'Delegatus non potest delegare' का सीधा उल्लंघन है।
निजता के अधिकार (Right to Privacy) का हनन: सर्वोच्च न्यायालय के के.एस. पुट्टास्वामी फैसले का हवाला देते हुए ट्रस्ट ने कहा कि यह प्रणाली ग्रामीण और तकनीक से अनभिज्ञ आबादी के संवेदनशील डेटा को साइबर अपराधियों की पहुंच में धकेल रही है।
अपराधियों को संरक्षण: ट्रस्ट के अनुसार, 'ऑटो-अप्रूवल' का अर्थ है मानवीय विवेक का अभाव। यह सिम-स्वैपिंग, जालसाजी और चोरी के वाहनों को वैध (Regularize) करने वाले गिरोहों को खुला निमंत्रण है।
जवाबदेही का अभाव: किसी भी तकनीकी खराबी या अवैध अप्रूवल की स्थिति में 'सिस्टम एरर' का बहाना बनाकर विभाग अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ लेगा, जो कि नैसर्गिक न्याय के विरुद्ध है।
ट्रस्ट की मांगें और अंतिम चेतावनी
इंडियन सोशल जस्टिस मिशन ट्रस्ट ने शासन से तत्काल प्रभाव से 'हाइब्रिड मॉडल' अपनाने की मांग की है, जहाँ एआई वेरिफिकेशन के बाद एक जिम्मेदार अधिकारी का डिजिटल हस्ताक्षर अनिवार्य हो। साथ ही, CERT-In के माध्यम से संपूर्ण प्रणाली का साइबर ऑडिट (VAPT) और पीड़ित नागरिकों के लिए एक विशेष 'विधिक शिकायत निवारण प्रकोष्ठ' के गठन की मांग की गई है।
कर्मवीर आजाद ने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा, "यदि शासन ने जनहित और सुरक्षा मानकों को ताक पर रखकर इस प्रणाली को जारी रखा, तो इंडियन सोशल जस्टिस मिशन ट्रस्ट नागरिकों के विधिक संरक्षण हेतु माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जनहित याचिका (PIL) दाखिल करने के लिए विवश होगा।"
जारीकर्ता:
कार्यालय, इंडियन सोशल जस्टिस मिशन ट्रस्ट
एस-18, शॉप नंबर-6, द्वितीय तल, आरटीओ ऑफिस के सामने,
ट्रांसपोर्ट नगर, कानपुर रोड, लखनऊ-226012
संपर्क सूत्र: 9839704000