सूर्य का 100 साल पुराना 'गुप्त बहीखाता': AI ने खोला कोडाइकनाल वेधशाला के कागजों में छिपा वो राज, जो पृथ्वी को बचाएगा बड़े आसमानी खतरे से!
विशेष विज्ञान ब्यूरो: 1 जुलाई 2026 की शाम विज्ञान और खगोल भौतिकी (Astrophysics) की दुनिया से एक ऐसी सनसनीखेज और संवेदनशील खबर सामने आई है, जिसने वैश्विक वैज्ञानिकों को हैरत में डाल दिया है। भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अधीन कार्यरत आर्यभट्ट अनुसंधान संस्थान (ARIES) के वैज्ञानिक दिब्य कीर्ति मिश्रा के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का इस्तेमाल करके सूर्य के एक ऐसे 'अदृश्य सच' को उजागर किया है, जो पिछले 100 सालों से कागज के पन्नों पर धूल फाँक रहा था।
वैज्ञानिकों ने आधुनिक मशीन लर्निंग की मदद से कोडाइकनाल सौर वेधशाला (KoSO) में रखे वर्ष 1916 से 2007 तक के हाथ से बनाए गए सौर रिकॉर्ड्स का पोस्टमार्टम किया है। ऊपरी तौर पर यह महज़ एक अकादमिक रिसर्च लग सकती है, लेकिन इसके पीछे छिपा सस्पेंस सीधे हमारी पृथ्वी की सुरक्षा और आधुनिक तकनीक के अस्तित्व से जुड़ा है!
'तितली आरेख' का रहस्य: क्यों इतिहास के पन्नों को खंगाल रहा है AI?
सौ सालों से भी अधिक समय से दुनिया भर के वैज्ञानिक सूर्य के उस खतरनाक और रहस्यमयी चुंबकीय चक्र को समझने की कोशिश कर रहे हैं, जो रह-रहकर सौर लपटें, विनाशकारी ज्वालाएं और कॉरोनल मास इजेक्शन (CME) पैदा करता है।
आसमान से मंडराता खतरा: सूर्य से उठने वाले ये चुंबकीय तूफान अगर पृथ्वी से टकरा जाएं, तो अंतरिक्ष में तैर रहे हमारे उपग्रह (Satellites), ग्लोबल नैविगेशन सिस्टम और जमीन पर पूरी बिजली आपूर्ति (Power Grids) को पल भर में ठप कर सकते हैं।
सस्पेंस की वजह: आधुनिक सैटेलाइट्स से पहले का सौर इतिहास वैज्ञानिकों के लिए एक अनसुलझी पहेली था। अलग-अलग चित्रकारों की शैली, कागज की ढलती उम्र और स्कैनिंग की खराब क्वालिटी के कारण 100 साल पुराना डेटा पूरी तरह अव्यवस्थित था। लेकिन इस रिसर्च में यू-नेट (U-Net) नामक सुपर-एडवांस्ड एआई मॉडल ने वो कर दिखाया जो इंसान कभी नहीं कर सकते थे।
'U-Net' का डिजिटल जाल: एआई ने कैसे पकड़े सूर्य के 'फिंगरप्रिंट्स'?
एस्ट्रोफिजिकल जर्नल (The Astrophysical Journal) में प्रकाशित इस शोध के मुताबिक, एआई मॉडल ने दो बेहद संवेदनशील और जासूसी चरणों में काम किया:
सूर्य की डिस्क की स्वचालित खोज: एआई ने सबसे पहले हर धुंधले और पुराने चित्र में सूर्य की डिस्क को खोजा, उसके केंद्र, सटीक आकार और झुकाव को मापा ताकि कोई भी जानकारी गलत जगह दर्ज न हो।
प्लेजेस (Plages) की घेराबंदी: इसके बाद एआई ने 9 सौर चक्रों के इतिहास में जाकर 'प्लेजेस' (सूर्य पर मौजूद चुंबकीय रूप से सक्रिय चमकीले क्षेत्र) की पहचान की। ये प्लेज दरअसल सूर्य के चुंबकत्व का असली "फिंगरप्रिंट" हैं।
इस एआई जासूसी के बाद वैज्ञानिकों के हाथ लगा सूर्य की सक्रियता का एक अद्भुत 'तितली आरेख' (Butterfly Diagram), जिसने 1916 से 2007 के बीच अक्षांश और सौर-चक्र के चरणों के साथ बदलते सूर्य के आक्रामक व्यवहार को पूरी तरह डिकोड कर दिया।
तिरुवनंतपुरम से अमेरिका तक फैला कूटनीतिक विज्ञान का जाल
इस महा-रिसर्च को अंजाम देने के लिए भारत और अमेरिका के शीर्ष संस्थानों ने हाथ मिलाया था। इसमें तिरुवनंतपुरम स्थित भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान, अमेरिका (बोल्डर) का दक्षिणपश्चिम अनुसंधान संस्थान और बेंगलुरु का भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (IIA) शामिल थे।
डेटा का 'जादुई' मिलान:
जब एआई द्वारा हाथ से बने चित्रों से निकाले गए डेटा का मिलान कोडाइकनाल के अत्याधुनिक Ca II K पूर्ण-डिस्क प्रेक्षणों से किया गया, तो दोनों के नतीजे बिल्कुल सटीक बैठे। इसका मतलब यह है कि अब वैज्ञानिक अतीत के डेटा के खाली अंतरालों (Gaps) को भरकर भविष्य में आने वाले विनाशकारी सौर तूफानों की सटीक भविष्यवाणी कर सकेंगे।
सौर महा-अध्ययन के मुख्य बिंदु